मन के विकारों के छिपाने के लिए वस्त्र धारण करने पड़ते हैं मुनिश्री सुप्रभ सागर
सिंगोली । जो ज्ञान ध्यान में तत्पर रहते हैं, आरम्भ और परिग्रह से रहित है वे साधु प्रशंसनीय कहे जाते हैं। वे ही गुरु पद को प्राप्त होते है। दिगम्बर जैन श्रमण परम्परा में साधु नग्न अवस्था में रहते हैं। वे यथाजात बालक के समान निर्विकार होते हैं। मन के विकारों के छिपाने के लिए […]
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