त्याग और प्रेम से परिवार चलते है स्वार्थ से नहीं – स्वामी श्री सत्यव्रत चैतन्य जी
मंदसौर। पुरूषोत्तम (अधिक) मास के अवसर पर केशव सत्संग भवन, खानपुरा में पुरूषोत्तम (अधिक) मास के शुभ अवसर पर पूज्य पाद स्वामी श्री सत्यव्रत चैतन्य जी नर्मदा तट द्वारा रामचरित मानस का वाचन 1 जून से प्रारंभ किया गया है जो 15 जून तक प्रतिदिन प्रात: 8.30 बजे से 10 बजे तक कथा का वाचन करेंगे।
दिनांक 6 जून 2026, शनिवार को रामचरित मानस शास्त्र का वाचन करते हुए स्वामी श्री सत्यव्रत चैतन्य जी ने बताया कि भगवान राम और माता सीता के साथ अन्य सभी भाई अपनी पत्नीयों के साथ अयोध्या आते है और सभी का जोरदार स्वागत होता है। एक माह बाद भगवान के राम के राज्याभिषेक की घोषणा हो जाती है जिसके बाद मंतरा महारानी कैकई को भडकाती है और मंतरा के कहने पर कैकई महाराज दशरथ से भगवान राम को 14 वर्षो के वनवास पर भेजने का वचन मांगती है पिता के वचन का मान रखते हुए भगवान राम वनवास के लिए स्वत: तैयार हो जाते है। उनके साथ लक्ष्मण और माता सीता भी जाती है उन्हें अन्य परिजन रोकने का प्रयास करते है लेकिन वे नहीं मानते है और लक्ष्मण प्रण लेते है कि भगवान राम और माता सीता की रक्षा के लिए 14 वर्षो तक सोयेगे नहीं वहीं जब भरत को यह मालूम पड़ता है तो वे भी भगवान राम की गद्दी नहीं लेते और अपना राज्याभिषेक भी नहीं करवाते।
स्वामी जी ने बताया कि आज के समय में परिवारों में त्याग और प्रेम खत्म होकर स्वार्थ आ गया तभी परिवार चलते नही। परिवार को चलाने के लिए मन मारना पडता है सहनशील होना पड़ता है लेकिन आज परिवारों में इन चीजों का अभाव हो गया है। स्नेह और त्याग कोई नहीं करना चाहता। रामायण में आया यह वृतांत हमें बताया है कि भाई – भाई का रिश्ता क्या होता है लेकिन आज तो थोडे से स्वार्थ के लिए सब आपस में दुश्मन हो जाते है।
स्वामी ने बताया कि जब भगवान राम अयोध्या छोडकर निकलते है तो सबसे पहले सुरयु नदी के तट पर राजा निषादराज के यहां पहुंचते है राजा निषादराज और भगवान राम बचपन के मित्र होते है जब निषाद भगवान को ऐसी अवस्था में देखते है तो बडा दुख होता है कि कहां महाराजा इतना सुख इतना वैभव और कहा वनवासी जीवन आज के समय ऐसी मित्रता भी देखने को नही मिलती कि अपनी अवस्था देख मित्र को दुख हो। स्वामी ने बताया कि अब आगे भगवान के वनवास का वृतांत बताया जायेगा।

