खनकती चूड़ियां और गूंजते लोकगीत: रतनगढ़ में श्रद्धा और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया गणगौर उत्सव

खनकती चूड़ियां और गूंजते लोकगीत: रतनगढ़ में श्रद्धा और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया गणगौर उत्सव

क्षेत्रीय खबरें नीमच

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खनकती चूड़ियां और गूंजते लोकगीत: रतनगढ़ में श्रद्धा और उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया गणगौर उत्सव

रतनगढ़। आस्था, अटूट प्रेम और राजस्थानी संस्कृति के अनूठे पर्व ‘गणगौर’ का उत्साह इस वर्ष रतनगढ़ में अपने चरम पर रहा। पूरे नगर में उत्सव का माहौल ऐसा था कि हर मार्ग भक्ति और पारंपरिक लोकगीतों की स्वर लहरियों से गुंजायमान हो उठा। सुहागिन महिलाओं और युवतियों ने बड़ी श्रद्धा के साथ माता गणगौर और ईसर जी की आराधना कर अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना की।
भक्ति और परंपरा का संगम दिन की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई। नव-विवाहितों और सौभाग्यवती महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर मंदिरों में माता गणगौर का विधि-विधान से पूजन किया। दूब और फूलों से माता की पूजा करते समय गाए गए पारंपरिक गीतों ने वातावरण को पूरी तरह राजस्थानी संस्कृति के रंग में रंग दिया। घरों और देवालयों में माता को विशेष पकवानों का भोग लगाया गया।
गोवर्धननाथ मंदिर से निकली भव्य ‘झेल’ शाम के समय उत्सव का आकर्षण तब और बढ़ गया जब नगर के ऐतिहासिक गोवर्धननाथ मंदिर से भव्य ‘झेल’ (शोभायात्रा) का शुभारंभ हुआ। इस शोभायात्रा में माहेश्वरी समाज, सोनी समाज, और ब्राह्मण समाज सहित विभिन्न समाजों की महिलाएं और युवतियां शामिल हुईं। सतरंगी लहरिया और राजस्थानी वेशभूषा में सजी महिलाओं के हाथों की खनकती चूड़ियों और पायलों की झंकार ने वातावरण को मोहक बना दिया।
डीजे की धुन पर लोक संस्कृति का नृत्य जैसे-जैसे शोभायात्रा आगे बढ़ी, उत्साह दुगुना होता गया। आधुनिक डीजे की धुन पर बज रहे पारंपरिक राजस्थानी गीतों ने समां बांध दिया। महिलाएं और युवतियां आत्मविभोर होकर थिरकती नजर आईं। यह ‘झेल’ नगर के प्रमुख चौराहों और मार्गों से होकर गुजरी, जहाँ स्थानीय निवासियों ने पुष्प वर्षा कर और ‘माता गणगौर के जयकारों’ के साथ यात्रा का भव्य स्वागत किया।
सफलतापूर्वक संपन्न हुआ आयोजन आयोजन की व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हुए सोनी समाज की किरण सोनी ने बताया कि, “इस वर्ष का आयोजन अत्यंत भव्य रहा। कार्यक्रम की सफलता के लिए काफी समय पहले से ही रूपरेखा तैयार कर ली गई थी। सभी समाजों के आपसी सहयोग और समयबद्ध प्रबंधन के कारण ही यह पारंपरिक पर्व एक यादगार उत्सव बन सका।”
देर शाम तक चले इस समारोह में नगरवासियों का भारी हुजूम उमड़ा, जिससे रतनगढ़ की सड़कें उत्सव के रंगों से सराबोर रहीं। अंत में माता की विदाई और आरती के साथ इस भव्य आयोजन का समापन हुआ।

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