किसी धार्मिक परंपरा की शुरुआत भले ही छोटी हो, लेकिन जब उसमें श्रद्धा, सेवा और समाज का सहयोग जुड़ जाए तो वही छोटी-सी पहल कालांतर में एक ऐसी विरासत बन जाती है, जिससे पूरा नगर भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है। रतनगढ़ के पुराना बस स्टैंड पर करीब 20 वर्षों से मनाया जा रहा गणेश उत्सव आज इसी आस्था और समर्पण की जीवंत कहानी बन चुका है।
करीब दो दशक पहले समाजसेवी राजेंद्र अग्रवाल ने पुराना बस स्टैंड पर छोटी-सी पहल के रूप में श्री गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि बप्पा की आराधना का यह छोटा-सा दीपक 20 वर्षों बाद इतनी बड़ी धार्मिक परंपरा का रूप ले लेगा। लेकिन श्रद्धा की यह ज्योत लगातार जलती रही और हर वर्ष इसके साथ नगरवासियों का जुड़ाव बढ़ता गया।
आज विशाल पंडाल में श्री गणेशजी महाराज विराजमान हैं। चारों ओर भक्तिभाव का वातावरण है। महाआरती के समय श्रद्धालुओं के हाथ स्वतः जुड़ जाते हैं और “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है। आरती के बाद नगरवासियों और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया जाता है।
राजेंद्र अग्रवाल की तपस्या ने रखी थी नींव
समाजसेवी राजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि जब गणेश उत्सव की शुरुआत हुई थी, तब भी आयोजन को केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रखा गया। गणेश उत्सव के दौरान कवि सम्मेलन, खाटू श्याम भजन संध्या, 56 भोग और अन्नकूट उत्सव जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी उत्साह के साथ आयोजित किए जाते रहे।
उनका कहना है कि वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने नगर के लोगों को एक साथ जोड़ने का कार्य किया है। बप्पा के दरबार में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी श्रद्धा लेकर आता है और यही सामूहिक आस्था इस आयोजन की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।
भक्ति का पौधा आज बना विशाल वटवृक्ष
राजेंद्र अग्रवाल की उस छोटी-सी पहल को आज रतनगढ़ की युवा शक्ति आगे बढ़ा रही है। सोनू बाहेती सहित युवा टीम आपसी समन्वय और सेवा भाव के साथ आयोजन में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा का यह संगम गणेश उत्सव को एक अलग ही स्वरूप प्रदान कर रहा है। बालक-बालिकाओं से लेकर युवाओं और वरिष्ठजनों तक, सभी अपनी-अपनी श्रद्धा के साथ बप्पा के दरबार से जुड़े नजर आते हैं।
बप्पा के दरबार से जुड़ी है रतनगढ़ की भावनाएं
राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि त्रिलोकी देव दरबार गणेशजी महाराज रतनगढ़ का उदय तो हुआ ही है, साथ ही इस धार्मिक परंपरा से जुड़े नागरिकों, बालक-बालिकाओं और युवाओं का भी विकास हुआ है। आज रतनगढ़ के युवा विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं और व्यवसाय एवं नौकरी सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी मेहनत से नगर का नाम रोशन कर रहे हैं।
गणेश उत्सव की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को संस्कार और सामाजिक जुड़ाव से जोड़ने का माध्यम भी बनती जा रही है।
सब्जी मंडी में गूंजे गणपति बप्पा के जयकारे
इसी क्रम में रतनगढ़ की सब्जी मंडी में सोनू बाहेती सहित युवाओं द्वारा श्री गणेश भगवान की महाआरती की गई। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से आरती में भाग लिया। आरती के दौरान गूंजते जयकारों और भक्ति के वातावरण ने पूरे परिसर को गणेशमय कर दिया।
20 साल… एक आयोजन नहीं, आस्था की विरासत
पुराना बस स्टैंड पर शुरू हुई वह छोटी-सी पहल आज 20 वर्षों की यात्रा पूरी कर चुकी है। इन दो दशकों में बहुत कुछ बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन बप्पा के प्रति रतनगढ़ की आस्था आज भी उसी श्रद्धा के साथ कायम है।
राजेंद्र अग्रवाल द्वारा रोपी गई भक्ति की यह पौध आज युवाओं के समर्पण से वटवृक्ष का रूप ले चुकी है। आने वाली पीढ़ियां जब इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगी तो उनके पास केवल एक धार्मिक आयोजन की कहानी नहीं होगी, बल्कि 20 वर्षों की श्रद्धा, सेवा, संस्कार और सामूहिक आस्था की विरासत होगी। इसके साथ ही नगर परिषद रतनगढ झण्डा चोक में भी उत्साह के साथ मनाया जा रहा है
बप्पा के श्रीचरणों में झुकता रतनगढ़ आज मानो यही कह रहा है—
“जहां सच्ची श्रद्धा होती है, वहां भगवान का दरबार कभी छोटा नहीं होता।”
गणपति बप्पा मोरया… मंगलमूर्ति मोरया!
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