वाटरशेड से लाभांवित किसान ने नगदी फसलों को अपनाकर अपनी आय में किया इजाफा
नीमच जिले के जावद विकासखंड की ग्राम पंचायत दौलतपुरा जाट के ग्राम कीरता निवासी सीमांत कृषक श्री मुकुंददास बैरागी ने वर्षों से परम्परागत खेती पर ही निर्भर होने के कारण परिश्रम का उतना प्रतिफल उन्हें नही मिल पा रहा था। उनकी आपकी आय भी बहुत सीमित थी।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत संचालित वाटरशेड विकास कार्यक्रम ने मध्य प्रदेश के सीमांत किसानों के लिए जल संरक्षण, मृदा सुधार एवं आय-वृद्धि के नए अवसर सृजित किए है। कलेक्टर श्री हिमांशु चन्द्रा एवं जिला पंचायत सीईओ श्री अमन वैष्णव के मार्गदर्शन में वाटरशेड की टीम ने स्वयं कृषक के घर एवं खेत पर पहुँचकर आवश्यक दस्तावेज एकत्रित किए और योजना का लाभ प्रदान किया तथा सीधे उनके बैंक खाते में कुल राशि 23,200 रूपये की वित्तीय सहायता प्रदाय की।
वाटरशेड योजना के तहत लाभाविंत हितग्राही को वाटरशेड टीम के विशेषज्ञों ने ड्रिप सिंचाई एवं मल्चिंग (Mulching) जैसी जल-संरक्षण एवं लागत-कम करने वाली उन्नत तकनीकों को अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया। इन तकनीकों के प्रयोग जल की बचत, खरपतवार नियंत्रण में सहायता, फसल की उत्पादकता में वृद्धि होने के साथ ही कुल लागत में कमी आई। जल संरक्षण एवं वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों से प्रेरित होकर किसान मुकुन्द दास बैरागी ने आपने अपनी 1.25 बीघा जमीन में परंपरागत फसलों के स्थान पर टमाटर की उन्नत खेती करने का निर्णय लिया।
जो उनके लिए आर्थिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी साबित हुआ। उन्नत किस्म के बीजों का चयन, संतुलित पोषण प्रबं, जैविक एवं रासायनिक कीटनाशकों का समुचित उपयोग, ड्रिप सिंचाई प्रणाली, तार फेंसिंग कर फसलों की सुरक्षा में लगभग 60 हजार से 70 हजार की लागत आई। समय पर रोपाई, फसल की नियमित निगरानी तथा वैज्ञानिक कीट-रोग प्रबंधन के परिणामस्वरूप टमाटर की गुणवत्ता एवं उत्पादन में उल्लैखनीय वृद्धि हुई। उत्पादित फसल का विपणन निंबाहेड़ा मंडी में किया।
इस उन्नत खेती से कृषि श्री बैरागी का लगभग 3.5 लाख 2/3 लाख तक का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। यह सफलता केवल कृषक श्री मुकुंददास बैरागी की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि क्षेत्र के अन्य सीमांत किसानों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनी है। किसान मुकुन्ददास बैरागी का कहना है, कि यदि किसान केवल मूंगफली, सोयाबीन, गेहूं एवं चना जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर न रहकर आधुनिक नगदी फसलों को अपनाएं तथा जल संरक्षण तकनीक, उन्नत बीज और बाजार से जुड़ाव पर ध्यान दें, तो कम भूमि में भी अधिक आय अर्जित की जा सकती है।

